#33 – II पशु स्वास्थ्य गीता II
“पशु बीमार ना हो उसके लिए आचार संहिता”
● हमारे देश में तापमान अधिकतम 40 से 42 सेंटीग्रेड व गर्मी लगभग 10 महीने
तक रहती है। इसलिये गर्मी से बचाने के लिए, जानवरों को सीमेंट या लोहे की
चादर या सीमेंट कंक्रीट के शेड की बजाय बांस के तिरपाल या घास की छाया में
बांधे जिससे उन्हें गर्मी कम लगे।
● दूध देने के बाद, गायों या अन्य जानवरों को स्वतंत्र रूप से घूमने दें। जानवरों को
एक दिन में 5 से 7 मील चलने की जरूरत होती है जिससे उन्हें पर्याप्त व्यायाम
मिलता है और भोजन को पचाने में मदद मिलेगी।
● बांधने के लिए गर्दन के चारों ओर लोहे की जंजीरों के बजाय एक सुत की रस्सी
का उपयोग करें। लोहे की जंजीर भारी होती है जिससे गला छिल जाता है। वह
हिस्सा सूज जाता है और चेन गर्म होने पर गायों को जलन होती है।
● 25 से 30 लीटर स्वच्छ पानी को छानकर गायों को दिन में चार से पांच बार
पिलाएं। गायों को जब चाहे तब पानी पीने की व्यवस्था शेड या गौशाला में भी
करें। सप्ताह में दो बार पानी पीने की जगह को अच्छी तरह से रगड़ कर साफ
करें और चुने से पुताई करें। जानवरों के शरीर के वजन के प्रमाण के अनुसार
पानी उपलब्ध कराएं और हो सके तो पानी पीने की जगह पर टाइल्स लगवाए।
● सुनिश्चित करें कि जिन स्थानों पर गायों या मवेशियों को रखा गया है वे कीचड़
या गंदगी से नहीं भरे हो । फिनाइल, डीडीटी या चूने का छिड़काव करें। साथ ही
जगह को जंतु रहित और साफ रखें।
● एक ही हरी या सूखी घास देने के बजाय, मिश्रित घास की विभिन्न किस्मों की
घास व चारा उपलब्ध कराये। । बड़े जानवरों को रोजाना 10 से 15 किलो सूखा
चारा और 15 से 20 किलो हरा चारा खिलाएं। शरीर के वजन के अनुसार दें।
● प्रतिदिन, गायों को धूप में खुले में रखें और धूप स्नान कराएँ। सप्ताह में कम से
कम दो बार गायों को अच्छे से रगड़ कर नहलाये।
● रोज सुबह और रात को धूप जलाकर मच्छरों से बचाएं। नीम, आक, नीलगिरी,
गूगल और सूखे गोबर के साथ थोड़ा जौ मिलाकर धूप करें।
● दूध देने से पहले और बाद में, गाय या अन्य दूधारू जानवर के थनों को गुनगुने
पानी से धोले ताकि सूक्ष्म जीव जानवर के थनों में प्रवेश न करें।
● एलोपैथिक रसायनों के बजाय बीमार पशुओं को आयुर्वेदिक , होम्योपैथी और
गौमूत्र आधारित दवाएँ दें।
● बीमार जानवरों को अन्य अलग जगह पर बांधे ताकि स्वस्थ पशुओं को संक्रमण
न लगे और अन्य स्वस्थ पशु बीमार ना हो।
● गाय जैसे ही बछड़े को जन्म दे तुरंत ही 10 मिनट में उसे चारों थानों का 50
ग्राम दूध पिलाए और यदि वह थन से दूध नहीं पी पा रहा हो तो उसे मदद करें।
बच्चा देने के बाद सबसे पहले वाला दूध या खीरा में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व
एवं रोग प्रतिकारक शक्ति होती है जो आजीवन शक्ति और रोग-प्रतिरोधक
क्षमता प्रदान करता है।
● बच्चा देने के बाद कभी भी सारा दूध ना निकालकर 20 से 30 परसेंट दूध हर 2
से 3 घंटे में निकाल कर 24 घंटे में अड़र को खाली कर ले।बाद में सुबह शाम
आप जिस समय पर नियमित रूप से दूध निकालना चाहते हैं उस समय पर 12
घंटे के अंतराल में गाय का दूध निकालें।
● किसी बीमार या कमजोर बैल की सेवाएं न लें। एक स्वस्थ और शक्तिशाली नर
की सेवा लेनी चाहिए ताकि उनकी संतान शक्तिशाली पैदा हो।
● जानवरों को ताकत के लिए नमक की जरूरत होती है इसलिए पशु आहार या
बाटे में उचित मात्रा में नमक प्रदान करें साथ ही उचित मात्रा में केमिकल रहित
देसी गुड़ भी दे।
● वातावरण को ठंडा रखने के लिए गाय भैंस या पशु के रहने की जगह के
आसपास उचित मात्रा में छायादार पेड़ लगाएं।
● ब्याने के बाद जानवरों को सुवादाना, सोंठ, मेथी, खली, अजवाइन, गुड़, जौ,
खोपरा, मक्का, बाजरा, उड़द, मूंग आदि को अच्छे से पकाकर उचित मात्रा में
नमक मिलाकर पौष्टिक और स्वास्थ्य वर्धक आहार खिलाए।
● पशुओं को हर 15 दिन या महीने में एक बार स्वस्थ देसी गाय का तीन सौ ग्राम
गौमूत्र पिलाए।
● यदि माता निकले तो अंधविश्वास पूर्वक तांत्रिक बुलाने की जगह पर डॉक्टर की
सलाह के अनुसार देखभाल करें।
● यदि पागल कुत्ता, सांप या बिच्छू काटता है, तो इलाज के लिए तुरंत पशु
चिकित्सक को बुलाएं। तब तक पुस्तक में लिखी प्राथमिक चिकित्सा दी जा
सकती है।
● जानवरों को अपने परिवार के सदस्यों की तरह प्रेम और दुलार दे । प्रेम दुनिया
की सबसे शक्तिशाली दवा है।
● उचित और समय पर पशुओं का टीकाकरण करें।
● प्रसव के दौरान डॉक्टर उपस्थित रहे ऐसा प्रबंध करें।
● गायों या अन्य जानवरों को मारे या डराए नहीं।
● गायों और अन्य जानवरों को पर्याप्त ताज़ी हवा और सूर्य प्रकाश मिल सके ऐसे
शेड का प्रबंध करें साथ ही दूध निकालने के बाद स्वतंत्र रूप से खुले में घूमने
तथा पेड़ की छांव में बैठ सके ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करें।