#26 – क्षयरोग, टीबी, अस्थमा
लक्षण और कारण:
यह रोग विशेष रूप से अंधेरे, हवा तथा सूरज की रोशनी से रहित शेड या घरों में रहने
वाले जानवरों में और विशेष रूप से कुपोषित और रोगग्रस्त माता-पिता से पैदा हुए
गाय, भैंस या पशु में, साथ ही गंदगी, कीचड़ और नमी युक्त वातावरण में रहने वाले
जानवरों में पाया गया है।
इसके अलावा, माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस और माइकोबैक्टीरियम बोविस
नामक कीटाणुओं के कारण या विटामिन ए, सी और डी की कमी के कारण होता है।
इस रोग के कारण जानवर दुबला-पतला और कमजोर हो जाता है। खांसी होती है। सांस
लेने में कठिनाई होती है। ज्यादा भागदौड़ नहीं कर सकते। हड्डियां और पसलियां
दिखाई देती हैं। फेफड़े कमजोर हो जाते हैं। इसमें कफ जम जाता है। यदि समय पर
इलाज नहीं किया जाता है, तो यह पाचन तंत्र को प्रभावित करता है। जीर्ण, ज्वर यानी
हल्का बुखार आता है। जानवर मर भी सकते हैं।
बीमारी के
बीमारी के उपचार हेतू उपयुक्त पदार्थ:
| 500 ग्राम गौमूत्र (Cow Urine of Indigenous Breed) | 100 ग्राम तुलसी |
| 50 ग्राम लहसुन | 50 ग्राम गूगल |
| 25 ग्राम काली जीरी | 50 ग्राम सोंठ |
| 100 ग्राम द्राक्षासव | 50 ग्राम सितोपलादि चूर्ण |
| 25 ग्राम लॉन्ग | 50 ग्राम नीम गिलोय |
| 50 ग्राम आंवला चवनप्राश | 25 ग्राम पीप्पली |
| 50 ग्राम अरबी के पत्ते | 25 ग्राम गोखरू चूर्ण |
| 25 ग्राम नागर बेल के पत्ते | 25 ग्राम दालचीनी |
| 50 ग्राम अडूसा के पत्ते | 25 ग्राम चित्रक |
| 20 ग्राम हल्दी | 25 ग्राम बायविडंग |
| 25 ग्राम मुलेठी | 25 ग्राम सुदर्शन चूर्ण |
| 25 ग्राम काली मिर्च | 200 ग्राम देसी गाय का घी |
| 50 ग्राम गुड | 50 ग्राम आंवला उपरोक्त सामग्रियां अपने क्षेत्र में जितनी उपलब्ध हो सके उतनी सामग्री का उपयोग करें। |
कैसे बनाएं:
उपरोक्त आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों को काट कूट कर या बारीक पीसकर गौमूत्र में डालकर
अच्छी तरह उबालें । ठंडा होने पर तैयार मिश्रण को छानकर स्टील, मिट्टी या कांच के
बर्तन में रख ले। गाय भैंस या पशुओं की संख्या के अनुपात में दवाई बनाइए।
इस दवा का उपयोग 30 दिनों तक किया जा सकता है।
उपयोग कैसे करे:
तैयार घोल का 150 ग्राम बड़े बीमार जानवर को 300 ग्राम पानी के साथ मिलाकर
पिलाएं और छोटे जानवर को 50 ग्राम से 100 ग्राम तक पानी में मिलाकर पिलाएं ।
भोजन:
चावल, मक्का, जौ, ज्वार और बाजरा का 2 किलो मोटा पिसे हुए आटा, गुड या चीनी,
देसी गाय का घी के साथ गाय दूध मिलाकर हलवा बनाकर दिन में दो बार 500 ग्राम
खिलाएं। कच्चा पपीता, केला, गाजर, ककड़ी, आंवला, पालक, मेथी खिलाएं। तिल के
तेल का हलवा भी बनाकर खिला सकते हैं। दिन में एक बार 250 ग्राम तिल का तेल
दीजिए।
सावधानी:
पशुओं को साफ, स्वच्छ और सूर्य प्रकाश एवं हवादार खुली जगह पर रखें। सुबह सूरज
की रोशनी में दो से तीन घंटे तक बांधें या घुमाएं। मक्खियों और मच्छरों के काटने से
रोकें। साफ पानी पिलाए। आनुपातिक रूप से सूखा, हरा चारा प्रदान करें। जानवर से
ज्यादा काम ना करवाएं। सुबह की सूर्य किरणों में सूर्य स्नान करवाएं।
नोट:
गाय के घी, दूध, दही, गोबर और गौमूत्र आदि पंचगव्यों से पंचगव्य घृत का निर्माण
किया जाता है। पशु आहार या बांटे के साथ इस धृत को देने से क्षय रोग में लाभकारी है।
पंचगव्य घृत से हलवा भी बनाकर खिलाया जा सकता है। हलवा बनाने के लिए गेहूं के
आटे की जगह पर जौ के मोटे आटे का उपयोग करें।
यदि तपेदिक दूसरे चरण में है, तो चिकित्सक से चिकित्सा करवाए।
इस बीमारी से पीड़ित किसी भी गाय, भैंस या पशु का दूध अच्छी तरह से उबालने के
बाद ही प्रयोग में ले ।