#25 – गले का रोग
लक्षण और कारण:
यह जानवरों के गले की बीमारी है, गले के अंदर और बाहर सूजन आती है। अंदर
फफोले या घाव हो जाता हैं। भीतर की त्वचा लाल हो जाती है। जानवर के गले में बहुत
जलन होती है। सांस नहीं ले पाता। दर्द से पीड़ित होकर खाना नहीं खाता। मुंह से लार
गिरती है, बीमार हो जाता है। सुस्त होकर बैठा रहता है। जीभ कठोर हो जाती है।
फफोले पड़ जाते हैं। लार टपकती है। यह रोग बहुत ही संक्रामक है। एक साथ कई
जानवरों में हो सकता है। मृत्यु दर अधिक है। समय पर टीकाकरण से बीमारी नहीं
होती। अगर ऐसा होता है, तो इसका इलाज पशु चिकित्सक द्वारा किया जाना चाहिए।
यह रोग दूषित, जंतु युक्त पानी पीने से या सड़ा गला फंगस वाला हरा घास खाने पर
होने वाली मंदाग्नी या गर्म पदार्थ खाने पर हो जाता है।
बीमारी के
बीमारी के उपचार हेतू उपयुक्त पदार्थ:
| 500 ग्राम देसी गाय के दूध का मठ्ठा | 50 ग्राम मुलेठी |
| 25 ग्राम कत्था | 100 ग्राम हरा धनिया |
| 50 ग्राम एलोवेरा | 50 ग्राम मधु |
| 50 ग्राम बील्व का पाउडर | 50 ग्राम धनिया |
| 50 ग्राम अरंडी का तेल | 100 ग्राम तुलसी |
| 50 ग्राम बबूल की छाल | 50 ग्राम त्रिफला चूर्ण |
| 25 ग्राम हल्दी | 25 ग्राम गूगल |
| 100 ग्राम केमिकल बिना का देसी गुड उपरोक्त सामग्रियां अपने क्षेत्र में जितनी हो सके उतनी सामग्री का उपयोग करें। |
कैसे बनाएं:
उपरोक्त आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों को काट कूट कर तथा बारीक पीसकर मिला लें और
अच्छी तरह उबालें । ठंडा होने पर तैयार मिश्रण को छानकर स्टील, मिट्टी या कांच के
बर्तन में रख ले।
उपयोग कैसे करे:
विधि – 1: तैयार घोल को 100 ग्राम मात्रा में, बड़े बीमार जानवर को पिलाए और जीभ
पर लगाए। छोटे बच्चों के लिए लगभग 50 ग्राम घोल दिन में चार बार लगाएं।
विधि – 2: गौमूत्र में नमक, सोंठ, बबूल की छाल या पत्तियां डालें और इसे उबालें। सहन
हो सके उतना गर्म कॉटन के कपड़े को भिगो कर गले के बाहर के भाग पर सिकाई करें
या आक के गर्म पत्तों को गौमूत्र में डुबोकर सिकाई करें। रेत को गर्म करके या गोबर में
नमक डालकर गले पर लगाकर उस पर सिकाई करें। गरम पानी में डूबा कर सूती कपड़े
से भी सिकाई कर सकते हैं। गरम पानी के बैग से भी गले पर सिकाई की जा सकती है।
जीभ की बीमारी:
पशु की जीभ पर उपरोक्त बताई औषधी को अवश्य जिव्हा पर लगाएं। दिन में तीन से
चार बार कत्था और मुलेठी का पाउडर का छिड़काव किया जा सकता है। जीभ पर
एलोवेरा का गुद्दा पीसकर लगा सकते हैं। शहद भी लगा सकते हैं। हरा धनिया, गुलाब
और धनिया को उबालकर ठंडा करके पिलाएं ।
परिणाम:
गौमूत्र और जड़ी बूटियों से उपचार करने से पशुओं के गले की बीमारी और जीभ की
बीमारी ठीक हो जाएगी।
भोजन:
4 लीटर पानी में गुड, नमक, हल्दी, चावल, बाजरा, ज्वार, मक्का और जौ का 2 किलो
मोटा आटा डालें, इसे उबालें, ठंडा होने पर 2 लीटर छाछ डालें, बड़े जानवर को 2 लीटर
और छोटे जानवर को 1 लीटर दिन में तीन बार दे। या 3 लीटर दूध में 2 किलो मकई,
ज्वार, बाजरा, चावल या जौ का आटा मिलाकर अच्छे से उबालकर राब बनाए। इसमें
गुड़ या चीनी मिलाकर पिलाएं। खाने में केवल तरल पदार्थ दें । कच्चा, पक्का पपीता,
कद्दू, केला, गाजर, मूली आदि को छोटे टुकड़े कर कर मिश्री मिलाकर खिलाएं।
नोट:
कब्ज भी गले में छाले का कारण बनता है। चूंकि गौमूत्र रेचक और दर्द शामक है,
इसलिए इस बीमारी से जल्द ही राहत मिलेगी । गर्मी दूर हो जाएगी। एरंड या हरड़ का
जुलाब जरूर दे। पेट की गर्मी दूर होकर दर्द दूर हो जाएगा।
– पशु चिकित्सक द्वारा दी गई सलाह के अनुसार बीमारी का इलाज करें।